योग वासिष्ठ

 ⛤#श्रीयोगवासिष्ठः⛤

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☉#उत्पत्तिप्रकरणम्☉

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--चतुर्थ सर्गः--

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!!श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नमः!!



अविद्या संसृतिश्चित्तं मनो बन्धो मलस्तमः ।

इति पर्यायनामानि दृश्यस्य विदुरुत्तमाः।।47।।

नहि दृश्यादृते किञ्चिन्मनसो रूपमस्ति हि ।

दृश्यं चोत्पन्नमेवैतन्नेति वक्ष्याम्यहं पुनः ।।48 ।।

यथा कमलविजान्तः स्थिता कमलवल्लरी।

महाचित्परमाण्वस्तथा दृश्यं जगत्स्थितम्।।49।।

प्रकाशस्य यथाऽऽलोको यथा वातस्य चापलं ।

यथा द्रवत्वं पयसि दृश्यत्वं द्रष्टरीदृशम्।।50।।

अङ्गदत्वं यथा हेम्नि मृगनद्यां यथा जलम्।

भित्तिर्यथा स्वप्नपुरे तथा द्रष्टरी दृश्यधीः।।51।।

एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमनन्यदिव यत्स्थितम्।

तदप्युन्मार्जयाम्याशु त्वच्चित्तादर्शतो मलम्।।52।।



अर्थात- अविद्या ,संसार,चित्त,मन,बन्धन,मल,तम- यह सब दृश्य के पर्यायवाची शब्द हैं,ऐसा विद्वान लोग कहते हैं ।दृश्य के अतिरिक्त मन का कोई स्वरूप नहीं है,यदि उत्पन्न दृश्य ही अविद्या और मन है, तो उनकी अनादिता कैसी? यह दृश्य उत्पन्न ही नहीं हुआ है ,ऐसा मैं आगे कहूंगा ।जैसे कमलगट्टे के अंदर कमललता स्थित रहती है,वैसे ही महाचैतन्य रूप परमाणु के अन्दर यह जगत स्थित हैं ।जिस प्रकार से प्रकाशक का आलोक स्वभाव है,जैसे वायु का चाञ्चल्य स्वभाव है और जैसे जल का द्रवत्व स्वभाव है ,वैसे ही द्रष्टा में दृश्यत्व है ।जिस प्रकार से स्वर्ण में केयूरत्व है, जैसे मृगतृष्णा में जल हैं और जैसे स्वप्न में नगर इत्यादि का भासना है वैसे ही द्रष्टा में दृश्य बुद्धि हैं । इस प्रकार द्रष्टा में जो दृश्यत्व अभिन्न सा स्थित है, उसको भी तुम्हारे चित्त रूपी आदर्श से शीघ्र निवृत्त करता हूँ ।


यद् द्रष्टुरस्याऽद्रष्टृत्वं दृश्याभावे भवेद् बलात् ।

तद्विद्धि केवलीभावं तत एवाऽसतः सतः।।53।।

तत्तामुपगते भावे रागद्वेषादिवासनाः।

शाम्यन्त्यस्पन्दिते वाते स्पन्दनक्षुब्धता यथा।।54।।


अर्थात- दृश्य का अभाव होने पर इस द्रष्टा में जो अद्रष्टता बलात् प्राप्त होती है, उसी को सन्मात्र चिद्रूप से अवशिष्ट आत्मा का केवलीभाव जानो ।चित्त के कैवल्य ज्ञान द्वारा केवलीभाव को प्राप्त होने पर जिस प्रकार से वायु के स्पन्दन रहित होने पर वन, जलाशय आदि में वायु स्पन्दन प्रयुक्त चञ्चलता शांत हो जाती है, वैसे ही केवलीभावापन्न मन में राग और द्वेष आदि वासनाए शान्त हो जाती है ।


असंभवति सर्वस्मिन् दिग्भूम्याकाशरूपिणि ।

प्रकाश्ये यादृशं रूपं प्रकाशस्याऽमलं भवेत् ।।55।।

त्रिजगत्त्वमहं चेति दृश्येऽसत्तामुपागते ।

द्रष्टु: स्यात् केवलीभावस्तादृशो विमलात्मनः ।।56।।


अर्थात- प्रकाश्य दिशा, भूमि ,आकाश आदि सम्पूर्ण पदार्थों के न रहने पर जिस प्रकार से प्रकाश का शुद्ध स्वरूप ही अवशिष्ट रहता है उसी प्रकार से तीनों जगत ,त्वम्, अहम् इत्यादि दृश्यो के न रहने पर विमलस्वरूप द्रष्टा का केवलीभाव ही रहता है ।


अनाप्ताखिलशैलादिप्रतिबिम्बे हि यादृशी।

स्याद् दर्पणे दर्पणता केवलात्मस्वरूपिणी।।57।।

अहं त्वं जगदित्यादौ प्रशान्ते दृश्यसंभ्रमे ।

स्यात्तादृशी केवलता स्थिते द्रष्टर्यवीक्षणे।।58।।


अर्थात- जिसमें सम्पूर्ण पर्वत आदि का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ा है ऐसे दर्पण में जैसे केवल आत्म स्वरूप भूत दर्पणता ही रहती है, वैसे ही त्वं,अहं ,यह जगत इत्यादि दृश्य भ्रम के शांत होने पर दृश्योन्मुखता शून्य द्रष्टा में केवलता ही रहती है ।


क्रमशः ।

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