योगवासिष्ठ

 ⛤#श्रीयोगवासिष्ठः⛤

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☉#उत्पत्तिप्रकरणम्☉

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--चतुर्थ सर्गः--

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!!श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नमः!!


●श्री राम उवाच●


सच्चेन्न शाम्यत्येवेदं नाऽभावो विद्यते सतः।

असत्तां च न विद्मोऽस्मिन् दृश्ये दोषप्रदायिनि ।।59।।

तस्मात्कथमियं शाम्येद् ब्रह्मन दृश्यविषूचिका।

मनोभवभ्रमकरी दुःखसन्ततिदायिनी।।60।।


श्री राम चन्द्र जी ने कहा- 


भगवन!यह दृश्य यदि सत् हैं, तो उसकी निवृति नहीं हो सकेगी,क्योंकि सत् की कभी भी निवृति नहीं हो सकती ।दुःखदायी दृश्य की असता हम लोगों को प्रतीत नहीं होती, इसलिए यह दृश्य रुपी महामारी कैसे शान्त होगी? दृश्य रुपी महामारी मन से जन्म आदि भ्रम को उत्पन्न करने वाली और दुःख परम्परा को देने वाली हैं ।


जगत् यद्यपि असत् हैं, फिर भी अविद्या के कारण यह सत् प्रतीत होता है ।केवलीभाव का साक्षात्कार होने से अविद्या की निवृति हो जाने से वैसा भ्रम नही होता, यह गूढ़ अभिप्राय है ।पहले जीवन मुक्ति पाने वाले पुरुषों के अनुभव रुप प्रमाण से तथा अनिर्मोक्ष की आपत्ति से दृश्य में सत्यता विश्वास को निवृत्त कर रहे श्री वसिष्ठ जी विवर्तवाद का आश्रयण कर बोले- 


●श्री वसिष्ठ उवाच●


अस्य दृश्यपिशाचस्य शान्त्यैः मन्त्रमिमं श्रृणु ।

रामाऽत्यंन्तमयं येन मृतिमेष्यति नङ्क्ष्यति।।61।।


अर्थात- हे राम जी! इस दृश्य रुपी पिशाच के विनाश के लिए इस मंत्र को सुनो ,जिससे चेतन रुप से अभिमत देहादिरुप यह पिशाच सर्वथा मर जायेगा और अचेतन रुप से अभिमत अन्तःकरण आदि रूप यह नष्ट हो जायेगा ।


यदस्ति तस्य नाशोऽस्ति न कदाचन राघव।

तस्मात् तन्नष्प्यन्तर्बीजभूतं भवेद्धदि।।62।।


अर्थात- हे राघव! जिस वस्तु का अस्तित्व है उसका कदापि नाश नहीं हो सकता ।इसलिए नष्ट हुआ भी वह बीज रूप से ह्रदय में विद्यमान रहता है ।भाव यह है कि परिणाम वाद में उत्तर उत्तर अवस्थाओं से पूर्व पूर्व अवस्थाओं का तिरोभाव मात्र होता हैं, उच्छेद नहीं होता, कारण की सत् का अभाव कभी हो नहीं सकता ।ऐसी अवस्था में नाश रूप षष्ठ विकार से तिरोहित द्वैत के चित्त में अथवा प्रकृति में स्थित रहने से काम, कर्म, वासनारूप बीज से पुनः उद्भव को कोई रोक नहीं सकता, अतः अनिर्मोक्ष प्रसङ्ग होगा ।


स्मृतिबीजाच्चिदाकाशे पुनरुद्भूय दृश्यधीः ।

लोकशैलाम्बराकारं दोषं वितनुतेऽतनुम्।।63।।


अर्थात- दृश्य बुद्धि स्मृति रुपी बीज से चिदाकाश में फिर उत्पन्न होकर भुवन, पर्वत, आकाश आदि आकार वाले महान दोष की सृष्टि करती है ।


इत्यनिर्मोक्षदोषः स्यात् न च तस्येह संभवः।

यस्माद्देवर्षिमुनयो दृश्यन्ते मुक्तिभाजनम्।।64।।

यदि स्याज्जगदादीदं तस्मान्मोक्षो न कस्यचित् ।

बाह्यस्थमस्तु ह्रत्स्थं वा दृश्यं नाशाय केवलम् ।।65।।

तस्मादिमां प्रतिज्ञां त्वं श्रृणु रामाऽतिभीषणाम्।

यामुत्तरेण ग्रन्थेन नूनं त्वमवबुध्यसे ।।66।।

अयमाकाशभूतादिरूपोऽहं चेति लक्षितः।

जगच्छब्दस्य नामाऽर्थो ननु नाऽस्त्येव कश्चन।।67।।

यदिदं दृश्यते किञ्चिद् दृश्यजातं पुरोगतम्।

परं ब्रह्मैव तत्सर्वमजरामरमव्ययम्।।68।।


अर्थात- इस प्रकार अनिर्मोक्ष रूप दोष होगा, पर उसका यहां पर संभव नहीं है, क्योंकि अनेक देवता, ऋषि, मुनि जीवन्मुक्त देखे जाते हैं ।यह चिदात्मा स्वभिन्न प्रधान में स्थित दृश्य को अविवेक से अपने ह्रदय में स्थित देखता है, वही उसका यह संसार हैं ।विवेक ज्ञान के उदय से पूर्वोक्त अविवेक जनित अभिमान की निवृति होने पर वाह्य पदार्थो के रहने पर भी मोक्ष हो जायेगा?

यदि इस जगत आदि का अस्तित्व  रहेगा, तो उससे किसी का भी मोक्ष नहीं होगा,वह दृश्य चाहे बाहर में स्थित हो या चाहे अन्तःकरण में स्थित हो पर वह केवल स्वरूप नाश के लिए ही होता है । इसलिए हे राम चन्द्र जी! आप अतिभीषण इस प्रतिज्ञा 

को सुनिए जिसका स्वरूप आप आगे के ग्रंथ से भलिभांति जान जायेंगे ।सामने जो ये भौतिक आकाश आदि और अंदर अहं आदि लक्षित होते हैं ,वे सब व्यवहार दशा में जगत है, किन्तु परमार्थ दशा में ब्रह्म ही है ।ब्रह्म के सिवा जगत शब्द का कोई दूसरा वास्तविक अर्थ नहीं है ।जो कुछ भी  दृश्य दिखाई देता है,वह सब अजर अमर अव्यय परम ब्रह्म ही है ।


क्रमशः ।

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